Thursday, 10 January 2013

जहाँ   देखो   वहाँ   मील  जायेगी  परछाइयाँ  अपनी 
बहुत    मशहूर   हैं   इस   शेहर   में  रुस्वाइयाँ अपनी 



तुम्हारी  तुम  ही  जानो एहले-दाना, ऐ  खिरद  वालो 
हमे   तो   रास   आती   हैं   सदा   नादानियाँ   अपनी  



दिले-नाशाद   तेरा   क्या   करे   आबाद   होकर   भी 
हमेशा   याद   रहती   हैं   तुझे    बरबादियाँ    अपनी 



बलन्दी  की  हकीक़त का  मज़ा  हरगिज़ न पाओगे 
अगर   देखी   नहीं    हैं   आपने  नाकामियाँ   अपनी 



हीसारे-दीद    से   बचना  बहुत  दुशवार  था लेकिन 
खुदा  का   शुक्र   हे   महफूज़  हैं  खामोशियाँ अपनी 



न  जाने  कब  मुकम्मल   देख   पायेगे   वजूदे-ज़ात 
कहीं  हम   हे, कहीं पैकर, कहीं  परछाइयाँ   अपनी 



सरापा    सुरते-गुलशन    सभी    से   पेश    आयेगी 
नुमायाँ   हो  नहीं   सकती  कभी वीरानियाँ  अपनी 



सुनेगा   और   कोई  किस तरह फरमाईये 'असलम'
कि जब तुम ही नहीं सुन पा रहे सरगोशियाँ अपनी 




-असलम मीर      

2 comments:

  1. waaaaaaaaah bhot khub aslm bhai waaaaaaaaah

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  2. ग़ज़ल बहुत खूब बाँधी है दोस्त पर वही है कुछ शब्दों के मतलब आपने नीचे लिख दिए होते तो पढने वालों को आसानी होती | लाजवाब आशार और बेहतरीन पेशकश | आदाब

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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